उत्तरापथ

अनेक वर्ष पहले विवेकानंद केंद्र की हिंदी मासिक पत्रिका “केंद्र भारती” में ये लेख लिखा था| पिछले दिनों नागपुर के साप्ताहिक “भारतवाणी” ने इसे पुनः प्रकाशित किया| मित्रों के आग्रह पर यहाँ प्रकाशित कर रहे है| – उत्तरापथ

“ये अपने केन्द्र में भी पक्षपात होता है ! कुछ लोगों को अधिक महत्व मिलता है, भले ही उनमें योग्यता कम हो ।” अनीश खीजता हुआ-सा बोला ।

रजत बात से सहमत था, “चापलूसी करते हैं न उनको महत्व मिलता है ।”

“नहीं । मैं यह नहीं कह रहा था । मुझे लगता है, महत्व उन्हें मिलता है जो जीवनव्रती बन सकता है । अन्य कोई कितना भी योग्य क्यों न हो, यदि वह जीवनव्रती नहीं बननेवाला है तो उसे महत्व नहीं मिलेगा ।” अनीश ने बात स्पष्ट की ।

दोनों को ध्यान ही नहीं था कि भाईजी कब कक्ष में आ गये ! भाईजी ने खाँसकर उनका ध्यान आकर्षित किया ।

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